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वन पर्व
अध्याय २०६
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ऋषिरु उवाच
तय़ा शुश्रूषय़ा सिद्धिं महतीं समवाप्स्यसि |  ५   क
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि |  ५   ख
शापक्षय़ान्ते निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति