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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अनिशं सन्दधानस्य शरानुत्सृजतस्तदा |  ६०   क
ददृशे नान्तरं किञ्चित्पार्थस्याददतोऽपि च ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति