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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं समरे नाराचैस्तत्र सप्तभिः |  १५   क
तं प्रत्यविध्यच्छैनेय़ः शरैर्हेमविभूषितैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति