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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां तत्र भूतानां लोमहर्षो व्यजाय़त |  १७   क
तद्दृष्ट्वा समरे कर्म कर्णशैनेय़योर्नृप ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति