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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
द्रौणिस्तु दृष्ट्वा राजेन्द्र धृष्टद्युम्नं रणे स्थितम् |  २२   क
क्रोधेन निःश्वसन्वीरः पार्षतं समुपाद्रवत् |  २२   ख
तावन्योन्यं तु दृष्ट्वैव संरम्भं जग्मतुः परम् ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति