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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तिष्ठसि संय़ुगे |  २५   क
नापक्रमसि वा मूढ सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति