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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
राधेय़ोऽपि महाराज पाञ्चालान्सह पाण्डवैः |  ३२   क
द्रौपदेय़ान्युधामन्युं सात्यकिं च महारथम् |  ३२   ख
एकः स वारय़ामास प्रेक्षणीय़ः समन्ततः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति