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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
पितामहं शान्तनवं स वृद्धं; द्रोणं गुरुं च प्रतिपूज्य मूर्ध्ना |  २६   क
द्रौणिं कृपं चैव गुरूंश्च सर्वा; ञ्शरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति