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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
नासुरामरगन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः |  ४७   क
न सर्पय़क्षपतगा न मनुष्याः कथञ्चन ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति