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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं जनेश्वर |  ४५   क
शरांश्चिक्षेप वै पार्थो द्रौणिं प्रति महावलः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति