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वन पर्व
अध्याय १३५
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लोमश उवाच
एनं पर्वतराजानमारुह्य पुरुषर्षभ |  ४   क
अय़शस्यामसंशव्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति