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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णो महाराज व्याक्षिपद्विजय़ं धनुः |  ५२   क
अर्जुनं समरे क्रुद्धः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः |  ५२   ख
द्वैरथं चापि पार्थेन कामय़ानो महारणे ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति