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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः |  ५५   क
सिंहनादश्च सञ्जज्ञे दृष्ट्वा घोरं महाद्भुतम् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति