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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु वचनादेव प्रकृतिस्था सरस्वती |  १३   क
प्रसन्नसलिला जज्ञे यथा पूर्वं तथैव हि |  १३   ख
विमुक्ता च सरिच्छ्रेष्ठा विवभौ सा यथा पुरा ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति