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द्रोण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युय़ुत्सुर्दशभिः शरैः |  ५१   क
त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेय़ा धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति