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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वानेतान्यन्नानि वर्जय़ेत् |  २२   क
राक्षसान्नमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति