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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवाञ्शक्रो व्रह्महत्यामवाप्तवान् |  २७   क
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति