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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वय़ात् |  ३२   क
हे मित्रहन्पाप इति व्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति