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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः |  ३३   क
पितामहाय़ सन्तप्त एवमर्थं न्यवेदय़त् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति