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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषु सर्वेषु तीर्थेषु आप्लुत्य मुनिपुङ्गवाः |  ५   क
प्राप्य प्रीतिं परां चापि तपोलुव्धा विशारदाः |  ५   ख
प्रय़युर्हि ततो राजन्येन तीर्थं हि तत्तथा ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति