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शान्ति पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्णः; सभामध्ये प्रीतिमान्पुष्कराक्षः |  १७   क
तमभ्यनन्दद्भारतं पुष्कलाभि; र्वाग्भिर्ज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्यः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति