शान्ति पर्व  अध्याय ४३

वैशम्पाय़न उवाच

विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |  ५   क
विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति