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उद्योग पर्व
अध्याय १९७
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वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च नागसहस्राणि रथवंशाश्च सर्वशः |  १७   क
पदातय़श्च ये शूराः कार्मुकासिगदाधराः |  १७   ख
सहस्रशोऽन्वय़ुः पश्चादग्रतश्च सहस्रशः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति