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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
औद्दालकेस्तथा यज्ञे यजतस्तत्र भारत |  २१   क
समेते सर्वतः स्फीते मुनीनां मण्डले तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति