शल्य पर्व  अध्याय ४५

वैशम्पाय़न उवाच

प्रतिगृह्य वरं देवास्तस्माद्विवुधसत्तमात् |  ५४   क
प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान्रिपून् ||  ५४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति