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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
एवम्प्राय़ो हि धर्मोऽय़ं क्षत्रिय़ाणां नराधिप |  ८   क
युद्धे क्षत्रिय़धर्मे च निरतोऽय़ं वृकोदरः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति