आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४३

सूत उवाच

एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात्स राजा जनमेजय़ः |  १७   क
पूजय़ामास तमृषिमनुमान्य पुनः पुनः ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति