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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
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जनमेजय़ उवाच
प्रिय़ं मे स्यात्कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चय़ः |  ५   क
प्रसादादृषिपुत्रस्य मम कामः समृध्यताम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति