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सभा पर्व
अध्याय ४३
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दुर्योधन उवाच
तथा हि रत्नान्यादाय़ विविधानि नृपा नृपम् |  २५   क
उपतिष्ठन्ति कौन्तेय़ं वैश्या इव करप्रदाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति