सभा पर्व  अध्याय ४३

वैशम्पाय़न उवाच

जले निपतितं दृष्ट्वा किङ्करा जहसुर्भृशम् |  ६   क
वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति