विराट पर्व  अध्याय ६१

वैशम्पाय़न उवाच

सोऽमृष्यमाणो वचसाभिमृष्टो; महारथेनातिरथस्तरस्वी |  २   क
पर्याववर्ताथ रथेन वीरो; भोगी यथा पादतलाभिमृष्टः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति