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वन पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिवर्हणः |  १   क
चिन्तय़ामास राजेन्द्र देवराजरथागमम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति