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वन पर्व
अध्याय ४३
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अर्जुन उवाच
त्वय़ि प्रतिष्ठिते साधो रथस्थे स्थिरवाजिनि |  १८   क
पश्चादहमथारोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति