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वन पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गाय़ामाप्लुतः शुचिः |  २०   क
जजाप जप्यं कौन्तेय़ो विधिवत्कुरुनन्दनः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति