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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
सागरानूपगांश्चैव ये च पत्तनवासिनः |  १९   क
सिंहलान्वर्वरान्म्लेच्छान्ये च जाङ्गलवासिनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति