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वन पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
तव सानूनि कुञ्जाश्च नद्यः प्रस्रवणानि च |  २५   क
तीर्थानि च सुपुण्यानि मय़ा दृष्टान्यनेकशः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति