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वन पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राजर्षय़ः सिद्धा वीराश्च निहता युधि |  ३२   क
तपसा च जितस्वर्गाः सम्पेतुः शतसङ्घशः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति