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वन पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः |  ३७   क
व्यरोचत यथा पूर्वं मान्धाता पार्थिवोत्तमः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति