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द्रोण पर्व
अध्याय ८
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धृतराष्ट्र उवाच
दिवि शक्र इव श्रेष्ठो महासत्त्वो महावलः |  ३२   क
स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति