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विराट पर्व
अध्याय ४३
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कर्ण उवाच
हताश्वं विरथं पार्थं पौरुषे पर्यवस्थितम् |  २०   क
निःश्वसन्तं यथा नागमद्य पश्यन्तु कौरवाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति