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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
मद्रराजे महाराज वित्रस्ताः शरविक्षताः |  ३   क
अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगाः सिंहार्दिता इव ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति