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सभा पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
राजश्रिय़ा दीप्यमानो यय़ौ व्रह्मपुरःसरः |  २१   क
धृतराष्ट्रेण चाहूतः कालस्य समय़ेन च ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति