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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
अभिमन्यौ हते राजञ्शिशुकेऽप्राप्तय़ौवने |  ३२   क
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा धर्मराजस्य पश्यतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति