वन पर्व  अध्याय १५७

वैशम्पाय़न उवाच

एवं प्रणिहितं भीम चिरात्प्रभृति मे मनः |  २४   क
द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्वाहुवलमाश्रिता ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति