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अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
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मतङ्ग उवाच
व्राह्मण्यं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैः शतक्रतो |  ९   क
सुदुर्लभं तदावाप्य नानुतिष्ठन्ति मानवाः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति