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मौसल पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो गते भ्रातरि वासुदेवो; जानन्सर्वा गतय़ो दिव्यदृष्टिः |  १६   क
वने शून्ये विचरंश्चिन्तय़ानो; भूमौ ततः संविवेशाग्र्यतेजाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति