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द्रोण पर्व
अध्याय १५६
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वासुदेव उवाच
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव |  २८   क
धर्मसंस्थापनार्थं हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति