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भीष्म पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
अभिमन्युर्महेष्वासो वृहद्वलमय़ोधय़त् |  १४   क
ततः कोसलको राजा सौभद्रस्य विशां पते |  १४   ख
ध्वजं चिच्छेद समरे सारथिं च न्यपातय़त् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति