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शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
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भीष्म उवाच
योऽन्योऽस्ति मत्तोऽभ्यधिको विप्रा यस्याधिकं प्रिय़ाः |  ९   क
यो व्रह्मण्यो द्वितीय़ोऽस्ति त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति