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द्रोण पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं नरश्रेष्ठं पुत्रो दुःशासनस्तव |  १४   क
विव्याध नवभिस्तूर्णं शरैः संनतपर्वभिः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति